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Saturday, April 7, 2012

गरीबी के लफ्ज़

जिसके सीने में शराफत है
उसको जीने में आफत है
ख़ुशी कम हो रही है, यूँ ही ख़तम हो रही है
दुःख में दिन हर दिन हो रहा इज़ाफ़त है
बढता महंगाई का बोलबाला, लगा गरीबे पे है ताला
क्यूंकि दौलत के साथ अब घूमती ताकत है
कोई है छपाए अथाह धन काला, कोई मुहं तरसे बिन निवाला
पानी नहीं लेकिन दारू बड़ी जरुरी, कोई शाम न रहे दारू बिन अधूरी,
बत्तर जिंदगी की बिगडती हुई हालत है
गुंडों में अत्याचार, नेता में भ्रस्टाचार
बेडागरग करके करते देश का उद्धार
इनकी ही वकालत है इनकी ही अदालत है

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