Friday, March 18, 2016

मैं मरुथल

हम दोनों के संबंधों की, केवल इतनी है सच्चाई ।
मैं मरुथल पसरा मीलों तक, तुम निर्झरणी सिंधु समाई ।।

मेरा जीवन ज्वलनशील है,
तुममें पूर्ण प्रेम, शीतलता,
मैं कठोर भीतर बाहर से,
तुममें केवल निहित सरलता,


युगों युगों से मैं प्यासा हूँ, मेरी तृष्णा बुझ ना पाई ।
मैं मरुथल पसरा मीलों तक, तुम निर्झरणी सिंधु समाई ।।
# अरुन अनन्त #

Tuesday, March 15, 2016

विवशता

टूट रहा है धीरे धीरे मन घिर कर बाधाओं में।
नित्य विवशता डाल रही है बेड़ी मेरे पावों में।।

 मध्य हृदय में प्रश्न अनगिनत व्याकुलता भर चलता हूँ,
किन्तु मुख पर लिए प्रसन्नता प्रतिदिन सबसे मिलता हूँ,

गुजर रहे हैं जैसे तैसे रातों दिन चिंताओं में।
नित्य विवशता डाल रही है बेड़ी मेरे पावों में।।

सुविधाओं से वंचित मेरा आखिर कब तक जीवन होगा,
सुख का पूर्ण आगमन कब तक अंत दुखों का सीजन होगा,

बाल्यकाल सम यौवन भी अब जाता दिखे अभावों में।
नित्य विवशता डाल रही है बेड़ी मेरे पावों में।।

अरुन अनन्त

Saturday, November 21, 2015

ताजा ग़ज़ल

एक लम्बे अंतराल के पश्चात ग़ज़ल :-

दूरियों का फैसला स्वीकार इस अनुबंध पर,
तुम खयालों का भी जाओगे घरौंदा छोड़कर,

दो मेरे प्रश्नों के उत्तर गुत्थियों को खोलकर,
क्यों अकारण तुम विरह के मार्ग पर हो अग्रसर,

जोत जाना तुम हृदय की प्रेम से सिंचित धरा,
मध्य उपजे मोह का प्रत्येक पौधा तोड़कर,

दो वचन गतिमान जीवन पूर्ववत होगा मेरा,
इन दिनों का वस्तुतः होगा न किंचित भी असर,

और हैं दो चार बातें इनका भी हल कीजिये,
चैन, नींदें, स्वप्न, खुशियाँ हो न जाएँ बेखबर,

तुम स्वयं ही तय करो इस प्रेम की श्रेणी प्रिये,
भावनाओं का मिलन? कहना उचित है सोचकर?

सोचना गंभीरता से क्या उचित है यह कदम,
यदि अकारण है तो ये प्रतिघात है विश्वास पर..

अरुन अनन्त

Friday, November 13, 2015

विवाह की चतुर्थ वर्षगाँठ

अपनी शादी के हुए, वर्ष आज हैं चार ।
अभिवादन शुभकामना, प्रिये करें स्वीकार ।।

एक दूसरे का सदा, रखते हुए ख़याल ।
कटते जाएँ प्रेम से, ये जीवन के साल ।।

तुम जीवन की संगिनी, तुम सुख का आधार ।
प्रिये तुम्हीं से पूर्ण है, मेरा यह संसार ।।
 
 
 
 

Monday, September 22, 2014

ग़ज़ल : प्रेम में हैं विभोर हम दोनों

प्रेम में हैं विभोर हम दोनों,
हो गए हैं किशोर हम दोनों.

चैन आराम लूट बैठे हैं,
बन गए दिल के चोर हम दोनों,

रूह से रूह का हुआ रिश्ता,
भावनाओं की डोर हम दोनों,

अग्रसर प्रेम के कठिन पथ पे,
एक मंजिल की ओर हम दोनों,

किन्तु अपना मिलन नहीं संभव,
हैं नदी के दो छोर हम दोनों..

Friday, September 19, 2014

ग़ज़ल : मौत के सँग ब्याह करके


देह का घर दाह करके,
पूर्ण अंतिम चाह करके,

जिंदगी ठुकरा चला हूँ,
मौत के सँग ब्याह करके,

खूब सुख दुख ने छकाया,
उम्र भर गुमराह करके,

प्रियतमा ने पा लिया है,
मुझको मुझसे डाह करके,

पूर्ण हर कर्तव्य आखिर,
मैं चला निर्वाह करके,

पुछल्ला :-
यदि ग़ज़ल रुचिकर लगे तो,
मित्र पढ़ना वाह करके,