Monday, December 23, 2013

आखिरी लम्हा सफ़र का पर निराला दे.

छल कपट लालच बुराई को निकाला दे,
जग हुआ अंधा अँधेरे से, उजाला दे,

झूठ हिंसा पाप से सबको बचा या रब,
शान्ति सुख संतोष देती पाठशाला दे,

शुद्धता जिसमें घुली हो जिसमें सच्चाई,
प्रेम से गूँथी हुई हाथों में माला दे,

स्वर्ण आभूषण की मुझको है नहीं चाहत,
भूख मिट जाए कि उतना ही निवाला दे,

जिंदगी जैसी भी चाहे दे मुझे मौला,
आखिरी लम्हा सफ़र का पर निराला दे..

Friday, December 6, 2013

दो गज़लें : अरुन शर्मा 'अनन्त'

बह्र : खफ़ीफ मुसद्दस मख़बून  

खूबसूरत हसीं परी होगी,
सोचता हूँ जो जिंदगी होगी,

सादगी कूटकर भरी होगी,
श्याम जैसी वो साँवरी होगी,

ख्वाहिशें क्यूँ भला अधूरी हैं,
मांगने में कहीं कमी होगी,

ख़त्म कर लें विवाद आपस का,
मैं गलत हूँ कि तू सही होगी,

मौत ने खा लिया बता देना,
जिस्म में जान जब नही होगी,

शांत चुपचाप दोस्त रहने दो,
सत्य बोलूँगा खलबली होगी....

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बह्र : मुतकारिब मुसम्मन सालिम

तमन्ना यही एक पूरी खुदा कर,
जमी ओढ़ लूँ मैं फलक को बिछा कर,

शुकूँ से भरी नींद अँखियों को दे दे,
दुआओं तले माँ के बिस्तर लगा कर,

बढ़ा हौसला दे मेरी झोपड़ी का,
बुजुर्गों के आशीष की छत बना कर,

अमन शान्ति का शुद्ध वातावरण हो,
मुहब्बत पिला दे शराफत मिला कर,

सितारों भरी एक दुनिया बसा रब,
अँधेरे का सारा जहाँ अब मिटा कर..

Sunday, December 1, 2013

दो गज़लें : अरुन शर्मा 'अनन्त'

कहानी प्रेम की लिख दो,
ह्रदय का पृष्ठ सादा है,

यही दिल की तमन्ना है,
तुम्हारा क्या इरादा है,

सुनो पर छोड़ मत देना,
इसी का डर जियादा है,

कभी ये कह न देना तुम,
कि वादा सिर्फ वादा है,

जुए की तुम महारानी,
बेचारा दिल तो प्यादा है....
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गिला शिकवा शिकायत है,
मुहब्बत पर निहायत है,

खुदा का है करम लेकिन,
तुम्हारी भी इनायत है,

कभी मेरी खिलाफत तो,
कभी मेरी हिमायत है,
(हिमायत - तरफदारी)

बुराई देखती हो तुम,
कभी देखो किफ़ायत है,
(किफ़ायत - गुण)

सदा दिल को दुखाने का,
तुम्हें हक़ है रियायत है....