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Wednesday, July 25, 2012

आदमी

आदमी को कर रहा है, तंग आदमी,



सभ्यता सीखा गया बे-ढंग आदमी,



कोशिशें कर-2 हुआ है, कामयाब अब,



आसमां में भर रहा है, रंग आदमी,



देख के लो हो गयीं, हैरान अंखियाँ,



ओढ़ बैठा है, बुरा फिर अंग आदमी,



सोंच के ना काम कोई आज तक किया,



जी रहा इन्हीं आदतों के, संग आदमी,



दूसरों के दुःख को हरदिन, बढाता था,



हाल अपना जान अब है, दंग आदमी............

5 comments:

  1. अंग अंग से हो गया है भंग आदमी |
    खुद से ही लड़ रहा है इक जंग आदमी ||

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  2. बहुत खूब ... आदमी की रंगत को पहचाना है आपने ... जिया है इन शेरों में ...

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  3. आदरणीय रविकर जी एवं दिगंबर जी बहुत-बहुत शुक्रिया.

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  4. बहुत बढ़िया अरुण जी
    अनु

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  5. आदरणीय रविकर जी दिगंबर जी एवं आदरणीया अनु जी, स्नेह के लिए तहे दिल से अभिनन्दन.....

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