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Wednesday, October 10, 2012

सबके कंधे झुक जाते हैं

ये लौ बुझनी है साँसों की,
जल-2 कर तन के चूल्हों में,

सोने-चाँदी का क्या करना,
इक दिन मिलना है धूलों में,

काँटों से डर कर  क्यूँ जीना,
जी भर सोना है फूलों में, 

सबके कंधे झुक जाते हैं,
जब कर बढ़ता है मूलों में, 

हर पल जीता है मरता है,
झूले जो दिल के झूलों में, 
 

21 comments:

  1. कथ्य शिल्प सबकुछ बेजोड़-
    सम्पूर्ण रचना -
    बधाई अरुण ||

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    1. आपको प्रणाम, बहुत-2 शुक्रिया आदरणीय रविकर सर

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  2. वाह ... बेहतरीन

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    1. बहुत-२ शुक्रिया सदा जी

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  3. सबके कंधे झुक जाते हैं,
    जब कर बढ़ता है मूलों में...........
    बहुत बढ़िया जी

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    1. बहुत-२ शुक्रिया उपासना जी

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  4. सुंदर भाव... http://www.kuldeepkikavita.blogspot.com पर भी आना।

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  5. सबके कंधे झुक जाते हैं,
    जब कर बढ़ता है मूलों में, waah

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  6. ये लौ बुझनी है साँसों की,
    जल-2 कर तन के चूल्हों में,
    बहुत प्यारी पंक्तियाँ.... सुन्दर भाव!

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    1. तहे दिल से शुक्रिया शालिनी जी

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  7. आपकी रचनाएँ बहुत ही बेहतरीन होती है..
    सुन्दर..
    :-)

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  8. बढ़िया लिखते हो अरुण ...
    बधाई !

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    1. बहुत-२ शुक्रिया सतीश सर

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  9. काँटों से डर कर क्यूँ जीना,
    जी भर सोना है फूलों में,
    .................wah arun bhai dar kar jeene bhi kya jeena hai........behtreen likha hai bhai

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    1. तहे दिल से शुक्रिया संजय भाई

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  10. सबके कंधे झुक जाते हैं,
    जब कर बढ़ता है मूलों में,

    हर पल जीता है मरता है,
    झूले जो दिल के झूलों में,

    bahut khoob....

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