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Monday, December 23, 2013

आखिरी लम्हा सफ़र का पर निराला दे.

छल कपट लालच बुराई को निकाला दे,
जग हुआ अंधा अँधेरे से, उजाला दे,

झूठ हिंसा पाप से सबको बचा या रब,
शान्ति सुख संतोष देती पाठशाला दे,

शुद्धता जिसमें घुली हो जिसमें सच्चाई,
प्रेम से गूँथी हुई हाथों में माला दे,

स्वर्ण आभूषण की मुझको है नहीं चाहत,
भूख मिट जाए कि उतना ही निवाला दे,

जिंदगी जैसी भी चाहे दे मुझे मौला,
आखिरी लम्हा सफ़र का पर निराला दे..

6 comments:

  1. अच्छी और कल्याणकारी सोच है !

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  2. बहुत ही सुन्दर पंक्तियाँ..

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  3. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार २४/१२/१३ को राजेश कुमारी द्वारा चर्चा मंच पर की जायेगी,आपका वहाँ हार्दिक स्वागत है।

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  4. जिंदगी जैसी भी चाहे दे मुझे मौला,
    आखिरी लम्हा सफ़र का पर निराला दे..
    ..बहुत सुन्दर नेक भाव ..
    अंत भला तो सब भला ..
    मकर सक्रांति की

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