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Thursday, May 9, 2013

ग़ज़ल : चोरी घोटाला और काली कमाई

बह्र : मुतकारिब मुसम्मन सालिम

चोरी घोटाला और काली कमाई,
गुनाहों के दरिया में दुनिया डुबाई,

निगाहों में रखने लगे लोग खंजर,
पिशाचों ने मानव की चमड़ी चढ़ाई,

दिनों रात उसका ही छप्पर चुआ है,
गगनचुम्बी जिसने इमारत बनाई,

कपूतों की संख्या बढ़ेगी जमीं पे,
कि माता कुमाता अगर हो न पाई,

हमेशा से सबको ये कानून देता,
हिरासत-मुकदमा-ब-इज्जत रिहाई,

गली मोड़ नुक्कड़ पे लाखों दरिन्दे,
फ़रिश्ता नहीं इक भी देता दिखाई...

5 comments:

  1. bilkul sahi kaha arun yahi sab sach hai
    nit naye kirtimaan banate raho

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  2. आपकी यह पोस्ट आज के (०९ मई, २०१३) ब्लॉग बुलेटिन - ख़्वाब पर प्रस्तुत की जा रही है | बधाई

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  3. अरुण जी बिलकुल सच लिखा आपने , लिखते रहिये !
    डैश बोर्ड पर पाता हूँ आपकी रचना, अनुशरण कर ब्लॉग को
    अनुशरण कर मेरे ब्लॉग को अनुभव करे मेरी अनुभूति को
    latest post'वनफूल'
    latest postअनुभूति : क्षणिकाएं

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  4. दिनों रात उसका ही छप्पर चुआ है,
    गगनचुम्बी जिसने इमारत बनाई,

    ...यथार्थ का बहुत सटीक चित्रण...बहुत उम्दा ग़ज़ल...

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  5. मुखौटों का बाजार गर्म है भाई,न जाने दरिंदे किस वेश में सामने आ जाये.बहुत ही सार्थक रचना.

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