
Friday, April 4, 2025 6:10:42 PM
Wednesday, January 22, 2020
Friday, March 18, 2016
मैं मरुथल
हम दोनों के संबंधों की, केवल इतनी है सच्चाई ।
मैं मरुथल पसरा मीलों तक, तुम निर्झरणी सिंधु समाई ।।
मेरा जीवन ज्वलनशील है,
तुममें पूर्ण प्रेम, शीतलता,
मैं कठोर भीतर बाहर से,
तुममें केवल निहित सरलता,
मैं मरुथल पसरा मीलों तक, तुम निर्झरणी सिंधु समाई ।।
मेरा जीवन ज्वलनशील है,
तुममें पूर्ण प्रेम, शीतलता,
मैं कठोर भीतर बाहर से,
तुममें केवल निहित सरलता,
युगों युगों से मैं प्यासा हूँ, मेरी तृष्णा बुझ ना पाई ।
मैं मरुथल पसरा मीलों तक, तुम निर्झरणी सिंधु समाई ।।
# अरुन अनन्त #
मैं मरुथल पसरा मीलों तक, तुम निर्झरणी सिंधु समाई ।।
# अरुन अनन्त #
Tuesday, March 15, 2016
विवशता
टूट रहा है धीरे धीरे मन घिर कर बाधाओं में।
नित्य विवशता डाल रही है बेड़ी मेरे पावों में।।
नित्य विवशता डाल रही है बेड़ी मेरे पावों में।।
मध्य हृदय में प्रश्न अनगिनत व्याकुलता भर चलता हूँ,
किन्तु मुख पर लिए प्रसन्नता प्रतिदिन सबसे मिलता हूँ,
किन्तु मुख पर लिए प्रसन्नता प्रतिदिन सबसे मिलता हूँ,
गुजर रहे हैं जैसे तैसे रातों दिन चिंताओं में।
नित्य विवशता डाल रही है बेड़ी मेरे पावों में।।
सुविधाओं से वंचित मेरा आखिर कब तक जीवन होगा,
सुख का पूर्ण आगमन कब तक अंत दुखों का सीजन होगा,
बाल्यकाल सम यौवन भी अब जाता दिखे अभावों में।
नित्य विवशता डाल रही है बेड़ी मेरे पावों में।।
अरुन अनन्त
Saturday, November 21, 2015
ग़ज़ल: दूरियों का फैसला स्वीकार इस अनुबंध पर
दूरियों का फैसला स्वीकार इस अनुबंध पर,
तुम खयालों का भी जाओगे घरौंदा छोड़कर,
तुम खयालों का भी जाओगे घरौंदा छोड़कर,
दो मेरे प्रश्नों के उत्तर गुत्थियों को खोलकर,
क्यों अकारण तुम विरह के मार्ग पर हो अग्रसर,
जोत जाना तुम हृदय की प्रेम से सिंचित धरा,
मध्य उपजे मोह का प्रत्येक पौधा तोड़कर,
दो वचन गतिमान जीवन पूर्ववत होगा मेरा,
इन दिनों का वस्तुतः होगा न किंचित भी असर,
और हैं दो चार बातें इनका भी हल कीजिये,
चैन, नींदें, स्वप्न, खुशियाँ हो न जाएँ बेखबर,
तुम स्वयं ही तय करो इस प्रेम की श्रेणी प्रिये,
भावनाओं का मिलन? कहना उचित है सोचकर?
सोचना गंभीरता से क्या उचित है यह कदम,
यदि अकारण है तो ये प्रतिघात है विश्वास पर..
अरुन अनन्त
क्यों अकारण तुम विरह के मार्ग पर हो अग्रसर,
जोत जाना तुम हृदय की प्रेम से सिंचित धरा,
मध्य उपजे मोह का प्रत्येक पौधा तोड़कर,
दो वचन गतिमान जीवन पूर्ववत होगा मेरा,
इन दिनों का वस्तुतः होगा न किंचित भी असर,
और हैं दो चार बातें इनका भी हल कीजिये,
चैन, नींदें, स्वप्न, खुशियाँ हो न जाएँ बेखबर,
तुम स्वयं ही तय करो इस प्रेम की श्रेणी प्रिये,
भावनाओं का मिलन? कहना उचित है सोचकर?
सोचना गंभीरता से क्या उचित है यह कदम,
यदि अकारण है तो ये प्रतिघात है विश्वास पर..
अरुन अनन्त
Friday, November 13, 2015
Monday, September 22, 2014
ग़ज़ल : प्रेम में हैं विभोर हम दोनों
प्रेम में हैं विभोर हम दोनों,
हो गए हैं किशोर हम दोनों.
हो गए हैं किशोर हम दोनों.
चैन आराम लूट बैठे हैं,
बन गए दिल के चोर हम दोनों,
बन गए दिल के चोर हम दोनों,
रूह से रूह का हुआ रिश्ता,
भावनाओं की डोर हम दोनों,
भावनाओं की डोर हम दोनों,
अग्रसर प्रेम के कठिन पथ पे,
एक मंजिल की ओर हम दोनों,
एक मंजिल की ओर हम दोनों,
किन्तु अपना मिलन नहीं संभव,
हैं नदी के दो छोर हम दोनों..
हैं नदी के दो छोर हम दोनों..
Friday, September 19, 2014
ग़ज़ल : मौत के सँग ब्याह करके
देह का घर दाह करके,
पूर्ण अंतिम चाह करके,
पूर्ण अंतिम चाह करके,
जिंदगी ठुकरा चला हूँ,
मौत के सँग ब्याह करके,
मौत के सँग ब्याह करके,
खूब सुख दुख ने छकाया,
उम्र भर गुमराह करके,
उम्र भर गुमराह करके,
प्रियतमा ने पा लिया है,
मुझको मुझसे डाह करके,
मुझको मुझसे डाह करके,
पूर्ण हर कर्तव्य आखिर,
मैं चला निर्वाह करके,
मैं चला निर्वाह करके,
पुछल्ला :-
यदि ग़ज़ल रुचिकर लगे तो,
मित्र पढ़ना वाह करके,
यदि ग़ज़ल रुचिकर लगे तो,
मित्र पढ़ना वाह करके,
Monday, September 15, 2014
गीत: नव पीढ़ी को मर्यादा का पाठ पढ़ाना भूल गए
गीत:-
गुण अवगुण के मध्य भिन्नता को समझाना भूल गए।
नव पीढ़ी को मर्यादा का पाठ पढ़ाना भूल गए।।
गुण अवगुण के मध्य भिन्नता को समझाना भूल गए।
नव पीढ़ी को मर्यादा का पाठ पढ़ाना भूल गए।।
अनहितकारी है परिवर्तन भाषा और विचारों में,
कड़वाहट अपनों के प्रति ही भरी हुई परिवारों में।
संबंधो के मीठे फल का स्वाद चखाना भूल गए।
नव पीढ़ी को मर्यादा का पाठ पढ़ाना भूल गए।।
कड़वाहट अपनों के प्रति ही भरी हुई परिवारों में।
संबंधो के मीठे फल का स्वाद चखाना भूल गए।
नव पीढ़ी को मर्यादा का पाठ पढ़ाना भूल गए।।
अंधकार से घिरे हुए हैं अंतर्मन अति मैला है,
अहंकार, लालच, कामुकता का विष नस में फैला है।
सदाचार, व्यवहार, मनुजता को अपनाना भूल गए।
नव पीढ़ी को मर्यादा का पाठ पढ़ाना भूल गए।।
अहंकार, लालच, कामुकता का विष नस में फैला है।
सदाचार, व्यवहार, मनुजता को अपनाना भूल गए।
नव पीढ़ी को मर्यादा का पाठ पढ़ाना भूल गए।।
मलिन आत्मा अंतर्मन भी अंत ईश्वर के प्रति निष्ठा,
निंदनीय कृत्यों के कारण नहीं स्मरण मान प्रतिष्ठा।
धर्मं, सभ्यता, मानवता, सम्मान बचाना भूल गए।
नव पीढ़ी को मर्यादा का पाठ पढ़ाना भूल गए।।
निंदनीय कृत्यों के कारण नहीं स्मरण मान प्रतिष्ठा।
धर्मं, सभ्यता, मानवता, सम्मान बचाना भूल गए।
नव पीढ़ी को मर्यादा का पाठ पढ़ाना भूल गए।।
Thursday, August 28, 2014
शीघ्र प्रकाश्य "सारांश समय का"
संकलन व विशेषांक
‘शब्द व्यंजना’ मासिक ई-पत्रिका हिन्दी भाषा व
साहित्य के प्रचार-प्रसार के लिए दृढ संकल्पित है. पत्रिका ने लगातार यह
प्रयास किया है कि हिन्दी साहित्य के वरिष्ठ रचनाकारों के श्रेष्ठ साहित्य
से पाठकों को रू-ब-रू कराने के साथ नए रचनाकारों को भी मंच प्रदान करे.
नियमित मासिक प्रकाशन के साथ ही पत्रिका समय-समय पर विधा-विशेष तथा
विषय-विशेष पर आधारित विशेषांक भी प्रकाशित करेगी जिससे कि उस क्षेत्र में
कार्यरत रचनाकारों की श्रेष्ठ रचनाओं को पाठकों तक पहुँचाया जा सके. इन विशेषांक में सम्मिलित रचनाकारों की रचनाओं को पुस्तक रूप में भी प्रकाशित करने का प्रयास होगा.
इसी क्रम में ‘शब्द व्यंजना’ का नवम्बर अंक ‘कविता विशेषांक’ के रूप में
प्रकाशित किया जाएगा. साथ ही, इस अंक में सम्मिलित रचनाकारों की अतुकांत
कविताओं का संग्रह पुस्तक रूप में भी प्रकाशित करना प्रस्तावित है.
पत्रिका अभी अपने शुरुआती दौर में है और व्यासायिक न होने के कारण अभी पत्रिका के पास ऐसा कोई स्रोत नहीं है जिससे पुस्तक-प्रकाशन के खर्च को वहन किया जा सके इसलिए यह कविता-संग्रह (पुस्तक) रचनाकारों से सहयोग राशि लेकर प्रकाशित किया जा रहा है.
प्रस्ताव-
कविता-संग्रह में ५० रचनाकारों को सम्मिलित किया जाना प्रस्तावित है.
कविता संग्रह २५६ पेज का होगा जिसमें प्रत्येक रचनाकार को ४ पेज प्रदान किए जाएँगे.
सहयोग राशि के रूप में रचनाकार को रु० ५५०/- (५००/- सहयोग राशि + ५०/- डाक व अन्य खर्च) का भुगतान करना होगा.
प्रत्येक रचनाकार को कविता-संग्रह की ३ प्रतियाँ प्रदान की जाएँगी.
इस संग्रह में सम्मिलित होने के लिए रचनाकार अपनी १० अतुकांत कविताएँ, अपने परिचय और फोटो के साथ 5 सितम्बर तक इस ई-मेल पर भेज सकते हैं-
shabdvyanjana@gmail.com
रचनाएँ भेजते समय शीर्षक ‘संकलन हेतु’ अवश्य लिखें. यह सुनिशिचित कर लें कि रचनाओं का आकर इतना हो कि ४ पेज में अधिक से अधिक रचनाएँ सम्मिलित की जा सकें. बहुत लम्बी अतुकांत रचनाएँ न भेजें.
इन १० रचनाओं में से संग्रह में प्रकाशित करने हेतु रचनाएँ चयनित की जाएँगी. शेष रचनाओं में से विशेषांक हेतु रचनाओं का चयन किया जाएगा. चयनित रचनाओं के विषय में प्रत्येक रचनाकार को सूचित किया जाएगा.
संग्रह में रचनाकार को वयानुसार स्थान प्रदान किया जाएगा.
संग्रह का लोकार्पण लखनऊ, इलाहाबाद अथवा दिल्ली में किया जाएगा. इस संग्रह का व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाएगा तथा समीक्षा कराई जाएगी जिससे रचनाकारों के रचनाकर्म का मूल्यांकन हो सके. संग्रह में सम्मिलित रचनाकारों की रचनाओं का प्रकाशन अन्य सहयोगी पत्र-पत्रिकाओं में भी सुनिश्चित किया जाएगा जिसकी सूचना रचनाकार को प्रदान की जाएगी. रचनाकारों के रचनाकर्म का व्यापक प्रचार इन्टरनेट की विभिन्न साइटों और ब्लोग्स पर भी किया जाएगा.
सहयोग राशि का भुगतान रचनाकार को रचना चयन के उपरान्त करना होगा जिसके सम्बन्ध में रचनाकार को सूचना प्रदान की जाएगी.
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प्रस्ताव-
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इन १० रचनाओं में से संग्रह में प्रकाशित करने हेतु रचनाएँ चयनित की जाएँगी. शेष रचनाओं में से विशेषांक हेतु रचनाओं का चयन किया जाएगा. चयनित रचनाओं के विषय में प्रत्येक रचनाकार को सूचित किया जाएगा.
संग्रह में रचनाकार को वयानुसार स्थान प्रदान किया जाएगा.
संग्रह का लोकार्पण लखनऊ, इलाहाबाद अथवा दिल्ली में किया जाएगा. इस संग्रह का व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाएगा तथा समीक्षा कराई जाएगी जिससे रचनाकारों के रचनाकर्म का मूल्यांकन हो सके. संग्रह में सम्मिलित रचनाकारों की रचनाओं का प्रकाशन अन्य सहयोगी पत्र-पत्रिकाओं में भी सुनिश्चित किया जाएगा जिसकी सूचना रचनाकार को प्रदान की जाएगी. रचनाकारों के रचनाकर्म का व्यापक प्रचार इन्टरनेट की विभिन्न साइटों और ब्लोग्स पर भी किया जाएगा.
सहयोग राशि का भुगतान रचनाकार को रचना चयन के उपरान्त करना होगा जिसके सम्बन्ध में रचनाकार को सूचना प्रदान की जाएगी.
Friday, August 22, 2014
एक तुम्हीं केवल जीवन में
मिट्टी से निर्मित इस तन में,
एक तुम्हीं केवल जीवन में,
अंतस में प्रिय विद्यमान तुम,
तुम ही साँसों में धड़कन में,
अधरों पर तुम मुखर रूप से,
अक्षर अक्षर संबोधन में,
सुखद मिलन की स्मृतियों में,
दुखद विरह की इस उलझन में,
मधुर क्षणों में तुम्हीं उपस्थित,
तुम्हीं वेदना की ऐठन में,
प्रखर प्रेम में पूर्ण तरह हो,
तुम हर छोटी सी अनबन में,
मानसपटल की स्थिररता में,
और तुम्हीं तुम व्याकुल मन में,
तुम्हीं कल्पना में भावों में,
तुम्हीं सम्मिलित हो लेखन में....
एक तुम्हीं केवल जीवन में,
अंतस में प्रिय विद्यमान तुम,
तुम ही साँसों में धड़कन में,
अधरों पर तुम मुखर रूप से,
अक्षर अक्षर संबोधन में,
सुखद मिलन की स्मृतियों में,
दुखद विरह की इस उलझन में,
मधुर क्षणों में तुम्हीं उपस्थित,
तुम्हीं वेदना की ऐठन में,
प्रखर प्रेम में पूर्ण तरह हो,
तुम हर छोटी सी अनबन में,
मानसपटल की स्थिररता में,
और तुम्हीं तुम व्याकुल मन में,
तुम्हीं कल्पना में भावों में,
तुम्हीं सम्मिलित हो लेखन में....
Monday, July 21, 2014
झाँसी की रानी पर आधारित "आल्हा छंद"
झाँसी की रानी पर आधारित 'अखंड भारत' पत्रिका के वर्तमान अंक में
सम्मिलित मेरी एक रचना. हार्दिक आभार भाई अरविन्द योगी एवं सामोद भाई जी
का.
सन पैंतीस नवंबर उन्निस, लिया भदैनी में अवतार,
आज धन्य हो गई धरा थी, हर्षित था सारा परिवार,
एक मराठा वीर साहसी, 'मोरोपंत' बने थे तात,
धर्म परायण महा बुद्धिमति, 'भागीरथी' बनी थीं मात.
आज धन्य हो गई धरा थी, हर्षित था सारा परिवार,
एक मराठा वीर साहसी, 'मोरोपंत' बने थे तात,
धर्म परायण महा बुद्धिमति, 'भागीरथी' बनी थीं मात.
मूल नाम मणिकर्णिका प्यारा, लेकिन 'मनु' पाया लघु-नाम,
हे भारत की लक्ष्मी दुर्गा, तुमको बारम्बार प्रणाम
चार वर्ष की उम्र हुई थी, खो बैठी माता का प्यार
शासक बाजीराव मराठा, के पहुँचीं फिर वह दरबार,
हे भारत की लक्ष्मी दुर्गा, तुमको बारम्बार प्रणाम
चार वर्ष की उम्र हुई थी, खो बैठी माता का प्यार
शासक बाजीराव मराठा, के पहुँचीं फिर वह दरबार,
अधरों के पट खुले नहीं थे, लूट लिया हर दिल से प्यार ,
पड़ा पुनः फिर नाम छबीली, बही प्रेम की थी रसधार,
शाला में पग धरा नहीं था , शास्त्रों का था पाया ज्ञान
भेद दिया था लक्ष्य असंभव, केवल छूकर तीर कमान,
पड़ा पुनः फिर नाम छबीली, बही प्रेम की थी रसधार,
शाला में पग धरा नहीं था , शास्त्रों का था पाया ज्ञान
भेद दिया था लक्ष्य असंभव, केवल छूकर तीर कमान,
गंगाधर झाँसी के राजा, वीर मराठा संग विवाह,
तन-मन पुलकित और प्रफुल्लित,रोम-रोम में था उत्साह,
शुरू किया अध्याय नया अब, लेकर लक्ष्मीबाई नाम,
जीत लिया दिल राजमहल का, खुश उनसे थी प्रजा तमाम
तन-मन पुलकित और प्रफुल्लित,रोम-रोम में था उत्साह,
शुरू किया अध्याय नया अब, लेकर लक्ष्मीबाई नाम,
जीत लिया दिल राजमहल का, खुश उनसे थी प्रजा तमाम
एक पुत्र को जन्म दिया पर, छीन गए उसको यमराज,
तबियत बिगड़ी गंगाधर की, रानी पर थी टूटी गाज,
दत्तक बेटा गोद लिया औ, नाम रखा दामोदर राव,
राजा का देहांत हुआ उफ़, जीवन भर का पाया घाव,
तबियत बिगड़ी गंगाधर की, रानी पर थी टूटी गाज,
दत्तक बेटा गोद लिया औ, नाम रखा दामोदर राव,
राजा का देहांत हुआ उफ़, जीवन भर का पाया घाव,
अट्ठारह सौ सत्तावन में , झाँसी की भड़की आवाम,
सीना धरती का थर्राया, शुरू हुआ भीषण संग्राम,
काँप उठी अंग्रेजी सेना, रानी की सुनकर ललकार,
शीश हजारों काट गई वह, जैसे ही लपकी तलवार,
सीना धरती का थर्राया, शुरू हुआ भीषण संग्राम,
काँप उठी अंग्रेजी सेना, रानी की सुनकर ललकार,
शीश हजारों काट गई वह, जैसे ही लपकी तलवार,
डगमग डगमग धरती डोली, बिना चले आंधी तूफ़ान,
जगह जगह लाशें बिखरी थीं, लाल लहू से था मैदान,
आज वीरता शौर्य देखकर, धन्य हुआ था हिन्दुस्तान,
समझ गए अंग्रेजी शासक, क्या मुश्किल औ क्या आसान,
जगह जगह लाशें बिखरी थीं, लाल लहू से था मैदान,
आज वीरता शौर्य देखकर, धन्य हुआ था हिन्दुस्तान,
समझ गए अंग्रेजी शासक, क्या मुश्किल औ क्या आसान,
शक्ति-स्वरूपा लक्ष्मी बाई , मानों दुर्गा का अवतार
आजादी की बलिवेदी पर, वार दिए साँसों के तार
अमर रहे झांसी की रानी, अमर रहे उनका बलिदान,
जब तक होंगे चाँद-सितारे, तब तक होगी उनकी शान...
आजादी की बलिवेदी पर, वार दिए साँसों के तार
अमर रहे झांसी की रानी, अमर रहे उनका बलिदान,
जब तक होंगे चाँद-सितारे, तब तक होगी उनकी शान...
Wednesday, June 4, 2014
ग़ज़ल : मुग्धकारी भाव आखर अब कहाँ
मुग्धकारी भाव आखर अब कहाँ,
प्रेम निश्छल वह परस्पर अब कहाँ,
मात गंगा का किया आँचल मलिन,
स्वच्छ निर्मल जल सरोवर अब कहाँ,
रंग त्योहारों का फीका हो चला,
सीख पुरखों की धरोहर अब कहाँ,
सभ्यता सम्मान मर्यादा मनुज,
संस्कारों का वो जेवर अब कहाँ,
सांझ बोझिल दिन ब दिन होती गई,
भोर वह सुखमय मनोहर अब कहाँ...
प्रेम निश्छल वह परस्पर अब कहाँ,
मात गंगा का किया आँचल मलिन,
स्वच्छ निर्मल जल सरोवर अब कहाँ,
रंग त्योहारों का फीका हो चला,
सीख पुरखों की धरोहर अब कहाँ,
सभ्यता सम्मान मर्यादा मनुज,
संस्कारों का वो जेवर अब कहाँ,
सांझ बोझिल दिन ब दिन होती गई,
भोर वह सुखमय मनोहर अब कहाँ...
Thursday, May 15, 2014
नेता जी
नेता जी :-
जनता की सेवा में अर्पण नेता जी,
ईश्वर जैसा रखते लक्षण नेता जी,
मधुर रसीले शब्द सजाये अधरों पर,
मक्खन मिश्री का हैं मिश्रण नेता जी,
छीन रहे सुख चैन हमारे जीवन से,
घर घर करते दुख का रोपण नेता जी,
रोजी रोटी की कीमत है रोज नई,
महँगाई का करते वितरण नेता जी,
जोड़ बहुत है पक्का इनका कुर्सी से,
फेविकोल का सुन्दर चित्रण नेता जी,
पलक झपकते रूप नए धर लेते ये,
हैं गिरगिट के मूल संस्करण नेता जी,
झूठ दिखावा छल से दूरी कोसों की,
साफ़ हमेशा जैसे दर्पण नेता जी,
बने चुनावी मौसम में हैं राम मगर,
दिल है काला औ हैं रावण नेता जी...
जनता की सेवा में अर्पण नेता जी,
ईश्वर जैसा रखते लक्षण नेता जी,
मधुर रसीले शब्द सजाये अधरों पर,
मक्खन मिश्री का हैं मिश्रण नेता जी,
छीन रहे सुख चैन हमारे जीवन से,
घर घर करते दुख का रोपण नेता जी,
रोजी रोटी की कीमत है रोज नई,
महँगाई का करते वितरण नेता जी,
जोड़ बहुत है पक्का इनका कुर्सी से,
फेविकोल का सुन्दर चित्रण नेता जी,
पलक झपकते रूप नए धर लेते ये,
हैं गिरगिट के मूल संस्करण नेता जी,
झूठ दिखावा छल से दूरी कोसों की,
साफ़ हमेशा जैसे दर्पण नेता जी,
बने चुनावी मौसम में हैं राम मगर,
दिल है काला औ हैं रावण नेता जी...
Tuesday, April 22, 2014
ग़ज़ल : मध्य अपने आग जो जलती नहीं संदेह की
ग़ज़ल :
बह्र : रमल मुसम्मन महजूफ
मध्य अपने आग जो जलती नहीं संदेह की,
टूट कर दो भाग में बँटती नहीं इक जिंदगी.
हम गलतफहमी मिटाने की न कोशिश कर सके,
कुछ समय का दोष था कुछ आपसी नाराजगी,
आज क्यों इतनी कमी खलने लगी है आपको,
कल तलक मेरी नहीं स्वीकार थी मौजूदगी,
यूँ धराशायी नहीं ये स्वप्न होते टूटकर,
आखिरी क्षण तक नहीं बहती ये नैनों की नदी,
रात भर करवट बदलना याद करना रात भर,
एक अरसे से यही करवा रही है बेबसी.........
********************
अरुन शर्मा अनन्त
********************
बह्र : रमल मुसम्मन महजूफ
मध्य अपने आग जो जलती नहीं संदेह की,
टूट कर दो भाग में बँटती नहीं इक जिंदगी.
हम गलतफहमी मिटाने की न कोशिश कर सके,
कुछ समय का दोष था कुछ आपसी नाराजगी,
आज क्यों इतनी कमी खलने लगी है आपको,
कल तलक मेरी नहीं स्वीकार थी मौजूदगी,
यूँ धराशायी नहीं ये स्वप्न होते टूटकर,
आखिरी क्षण तक नहीं बहती ये नैनों की नदी,
रात भर करवट बदलना याद करना रात भर,
एक अरसे से यही करवा रही है बेबसी.........
********************
अरुन शर्मा अनन्त
********************
Sunday, March 23, 2014
ग़ज़ल : अरुन शर्मा 'अनन्त'
परस्पर प्रेम का नाता पुरातन छोड़ आया हूँ,
नगर की चाह में मैं गाँव पावन छोड़ आया हूँ,
नगर की चाह में मैं गाँव पावन छोड़ आया हूँ,
सरोवर गुल बहारें स्वच्छ उपवन छोड़ आया हूँ.
सुगन्धित धूप से तुलसी का आँगन छोड़ आया हूँ,
सुगन्धित धूप से तुलसी का आँगन छोड़ आया हूँ,
कि जिन नैनों में केवल प्रेम का सागर छलकता था,
हमेशा के लिए मैं उनमें सावन छोड़ आया हूँ,
हमेशा के लिए मैं उनमें सावन छोड़ आया हूँ,
गगनचुम्बी इमारत की लिए मैं लालसा मन में,
बुजुर्गों की हवेली माँ का दामन छोड़ आया हूँ.
बुजुर्गों की हवेली माँ का दामन छोड़ आया हूँ.
मिलन को हर घड़ी व्याकुल तड़पती प्रियतमा का मैं,
विरह की वेदना में टूटता मन छोड़ आया हूँ,
विरह की वेदना में टूटता मन छोड़ आया हूँ,
अपरिचित व्यक्तियों से मैं नया रिश्ता बनाने को,
जुड़े बचपन से कितने दिल के बंधन छोड़ आया हूँ.
जुड़े बचपन से कितने दिल के बंधन छोड़ आया हूँ.
Thursday, March 13, 2014
गीत : प्रणय - प्रेम
जबसे तुमने प्रेम निमंत्रण स्वीकारा है,
बही हृदय में प्रणय प्रेम की रस धारा है,
बही हृदय में प्रणय प्रेम की रस धारा है,
मधुर मधुर अहसास अंकुरित होता है,
तन चन्दन की भांति सुगंधित होता है,
जैसे फूलों ने मुझपर गुलशन वारा है,
बही हृदय में प्रणय प्रेम की रस धारा है.
तन चन्दन की भांति सुगंधित होता है,
जैसे फूलों ने मुझपर गुलशन वारा है,
बही हृदय में प्रणय प्रेम की रस धारा है.
मनभावन मनमोहक सूरत प्यारी सी,
मधुर कंठ मुस्कान मनोरम न्यारी सी,
उज्जवल सूरत देखके होता भिनसारा है,
बही हृदय में प्रणय प्रेम की रस धारा है.
मधुर कंठ मुस्कान मनोरम न्यारी सी,
उज्जवल सूरत देखके होता भिनसारा है,
बही हृदय में प्रणय प्रेम की रस धारा है.
सरस देह सुकुमार लताओं के जैसी,
अनुपम छवि जलजात के सम हृदयस्पर्शी,
अलौकिक श्रृंगार विधाता के द्वारा है,
बही हृदय में प्रणय प्रेम की रस धारा है.
अनुपम छवि जलजात के सम हृदयस्पर्शी,
अलौकिक श्रृंगार विधाता के द्वारा है,
बही हृदय में प्रणय प्रेम की रस धारा है.
Wednesday, February 26, 2014
कुछ दोहे
सर्वप्रथम ह्रदय लुटे, बाद नींद औ ख्वाब ।
प्रेम रोग सबसे अधिक, घातक और ख़राब ।१।
धीमी गति है स्वास की, और अधर हैं मौन ।
प्रश्न ह्रदय अब पूछता, मुझसे मैं हूँ कौन ।२।
जब जब जकडे देह को, यादों की जंजीर ।
भर भर सावन नैन दो, खूब बहायें नीर ।३।
रुखा सूखा भाग में, कष्ट निहित तकदीर ।
करनी मुश्किल है बयां, व्यथित ह्रदय की पीर ।४।
जीवन भर मजबूरियां, मेरे रहीं करीब ।
सिल ना पाया मैं कभी, अपना फटा नसीब ।५।
प्रेम रोग सबसे अधिक, घातक और ख़राब ।१।
धीमी गति है स्वास की, और अधर हैं मौन ।
प्रश्न ह्रदय अब पूछता, मुझसे मैं हूँ कौन ।२।
जब जब जकडे देह को, यादों की जंजीर ।
भर भर सावन नैन दो, खूब बहायें नीर ।३।
रुखा सूखा भाग में, कष्ट निहित तकदीर ।
करनी मुश्किल है बयां, व्यथित ह्रदय की पीर ।४।
जीवन भर मजबूरियां, मेरे रहीं करीब ।
सिल ना पाया मैं कभी, अपना फटा नसीब ।५।
Friday, February 21, 2014
कुछ दोहे
प्रेम दिवस में मस्त हो, भूल गए माँ बाप ।
त्रुटियों का आभास ना, और न पश्चाताप ।१।
बदली संस्कृति सभ्यता, बदला है अंदाज ।
संबंधो पर गिर रही, परिवर्तन की गाज ।२।
मैली मन की भावना, दूषित हुए विचार ।
है क्षणभंगुर आजकी, नव पीढ़ी का प्यार ।३।
आजादी है नाम की, नाम मात्र गणतंत्र ।
व्यापित केवल देश में, पाप लोभ षड़यंत्र ।४।
हुआ मान सम्मान का, बंधन है कमजोर ।
बढ़ता जाता है मनुज, स्वयं पतन की ओर ।५।
मानव मस्ती मौज औ, मय की मद में चूर ।
अपने ही करने लगे, जख्मों को नासूर ।६।
त्रुटियों का आभास ना, और न पश्चाताप ।१।
बदली संस्कृति सभ्यता, बदला है अंदाज ।
संबंधो पर गिर रही, परिवर्तन की गाज ।२।
मैली मन की भावना, दूषित हुए विचार ।
है क्षणभंगुर आजकी, नव पीढ़ी का प्यार ।३।
आजादी है नाम की, नाम मात्र गणतंत्र ।
व्यापित केवल देश में, पाप लोभ षड़यंत्र ।४।
हुआ मान सम्मान का, बंधन है कमजोर ।
बढ़ता जाता है मनुज, स्वयं पतन की ओर ।५।
मानव मस्ती मौज औ, मय की मद में चूर ।
अपने ही करने लगे, जख्मों को नासूर ।६।
Thursday, February 13, 2014
गीत : पुलकित मन का कोना कोना
गीत
पुलकित मन का कोना कोना, दिल की क्यारी पुष्पित है.
अधर मौन हैं लेकिन फिर भी प्रेम तुम्हारा मुखरित है.
मिलन तुम्हारा सुखद मनोरम लगता मुझे कुदरती है,
धड़कन भी तुम पर न्योछावर हरपल मिटती मरती है,
गति तुमसे ही है साँसों की, जीवन तुम्हें समर्पित है,
अधर मौन हैं लेकिन फिर भी प्रेम तुम्हारा मुखरित है.
चहक उठा है सूना आँगन, महक उठी हैं दीवारें,
खुशियों की भर भर भेजी हैं, बसंत ऋतु ने उपहारें,
बाकी जीवन पूर्णरूप से केवल तुमको अर्पित है,
अधर मौन हैं लेकिन फिर भी प्रेम तुम्हारा मुखरित है.
मधुरिम प्रातः सुन्दर संध्या और सलोनी रातें हैं,
भीतर मन में मिश्री घोलें मीठी मीठी बातें हैं,
प्रेम तुम्हारा निर्मल पावन पाकर तनमन हर्षित है,
अधर मौन हैं लेकिन फिर भी प्रेम तुम्हारा मुखरित है.
पुलकित मन का कोना कोना, दिल की क्यारी पुष्पित है.
अधर मौन हैं लेकिन फिर भी प्रेम तुम्हारा मुखरित है.
मिलन तुम्हारा सुखद मनोरम लगता मुझे कुदरती है,
धड़कन भी तुम पर न्योछावर हरपल मिटती मरती है,
गति तुमसे ही है साँसों की, जीवन तुम्हें समर्पित है,
अधर मौन हैं लेकिन फिर भी प्रेम तुम्हारा मुखरित है.
चहक उठा है सूना आँगन, महक उठी हैं दीवारें,
खुशियों की भर भर भेजी हैं, बसंत ऋतु ने उपहारें,
बाकी जीवन पूर्णरूप से केवल तुमको अर्पित है,
अधर मौन हैं लेकिन फिर भी प्रेम तुम्हारा मुखरित है.
मधुरिम प्रातः सुन्दर संध्या और सलोनी रातें हैं,
भीतर मन में मिश्री घोलें मीठी मीठी बातें हैं,
प्रेम तुम्हारा निर्मल पावन पाकर तनमन हर्षित है,
अधर मौन हैं लेकिन फिर भी प्रेम तुम्हारा मुखरित है.
Thursday, February 6, 2014
बसंत के कुछ दोहे
बदला है वातावरण, निकट शरद का अंत ।
शुक्ल पंचमी माघ की, लाये साथ बसंत ।१।
अनुपम मनमोहक छटा, मनभावन अंदाज ।
ह्रदय प्रेम से लूटने, आये हैं ऋतुराज ।२।
धरती का सुन्दर खिला, दुल्हन जैसा रूप ।
इस मौसम में देह को, शीतल लगती धूप ।३।
डाली डाली पेड़ की, डाल नया परिधान ।
आकर्षित मन को करे, फूलों की मुस्कान ।४।
पीली साड़ी डालकर, सरसों खेले फाग ।
मधुर मधुर आवाज में, कोयल गाये राग ।५।
गेहूँ की बाली मगन, इठलाये अत्यंत ।
पुरवाई भी झूमकर, गाये राग बसंत ।६।
पर्व महाशिवरात्रि का, पावन और विशेष ।
होली करे समाज से , दूर बुराई द्वेष ।७।
अद्भुत दिखता पुष्प से, भौरों का अनुराग ।
और सुगन्धित बौर से, लदा आम का बाग़ ।८।
शुक्ल पंचमी माघ की, लाये साथ बसंत ।१।
अनुपम मनमोहक छटा, मनभावन अंदाज ।
ह्रदय प्रेम से लूटने, आये हैं ऋतुराज ।२।
धरती का सुन्दर खिला, दुल्हन जैसा रूप ।
इस मौसम में देह को, शीतल लगती धूप ।३।
डाली डाली पेड़ की, डाल नया परिधान ।
आकर्षित मन को करे, फूलों की मुस्कान ।४।
पीली साड़ी डालकर, सरसों खेले फाग ।
मधुर मधुर आवाज में, कोयल गाये राग ।५।
गेहूँ की बाली मगन, इठलाये अत्यंत ।
पुरवाई भी झूमकर, गाये राग बसंत ।६।
पर्व महाशिवरात्रि का, पावन और विशेष ।
होली करे समाज से , दूर बुराई द्वेष ।७।
अद्भुत दिखता पुष्प से, भौरों का अनुराग ।
और सुगन्धित बौर से, लदा आम का बाग़ ।८।
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